॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 6.5.8
नदीमुभयतोवाहां पञ्चपञ्चाद्भुतं गृहम्।
क्वचिद्धंसं चित्रकथं क्षौरपव्यं स्वयं भ्रमिम्॥ ८
nadīmubhayatovāhāṃ pañcapañcādbhutaṃ gṛham|
kvaciddhaṃsaṃ citrakathaṃ kṣaurapavyaṃ svayaṃ bhramim|| 8
अर्थ
देखो—एक ऐसा देश है, जिसमें एक ही पुरुष है। एक ऐसा बिल है, जिससे बाहर निकलनेका रास्ता ही नहीं है। एक ऐसी स्त्री है, जो बहुरूपिणी है। एक ऐसा पुरुष है, जो व्यभिचारिणीका पति है। एक ऐसी नदी है, जो आगे-पीछे दोनों ओर बहती है। एक ऐसा विचित्र घर है, जो पचीस पदार्थोंसे बना है। एक ऐसा हंस है, जिसकी कहानी बड़ी विचित्र है। एक ऐसा चक्र है, जो छुरे एवं वज्रसे बना हुआ है और अपने-आप घूमता रहता है। मूर्ख हर्यश्वो! जबतक तुमलोग अपने सर्वज्ञ पिताके उचित आदेशको समझ नहीं लोगे और इन उपर्युक्त वस्तुओंको देख नहीं लोगे, तबतक उनके आज्ञानुसार सृष्टि कैसे कर सकोगे?’॥ ७—९॥