॥ श्रीहरिः ॥
को गृध्येत् पण्डितो लक्ष्मीं त्रिविष्टपपतेरपि।
ययाहमासुरं भावं नीतोऽद्य विबुधेश्वरः॥ १२
ko gṛdhyet paṇḍito lakṣmīṃ triviṣṭapapaterapi|
yayāhamāsuraṃ bhāvaṃ nīto'dya vibudheśvaraḥ|| 12
अर्थ
भला, कौन विवेकी पुरुष इस स्वर्गकी राजलक्ष्मीको पानेकी इच्छा करेगा? देखो तो सही, आज इसीने मुझ देवराजको भी असुरोंके-से रजोगुणी भावसे भर दिया॥ १२॥
को गृध्येत् पण्डितो लक्ष्मीं त्रिविष्टपपतेरपि।
ययाहमासुरं भावं नीतोऽद्य विबुधेश्वरः॥ १२
भला, कौन विवेकी पुरुष इस स्वर्गकी राजलक्ष्मीको पानेकी इच्छा करेगा? देखो तो सही, आज इसीने मुझ देवराजको भी असुरोंके-से रजोगुणी भावसे भर दिया॥ १२॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 6.7.12 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 735) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/6/7/12/