श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 6.7.2

षष्ठ स्कन्ध · अध्याय 7 · अथ सप्तमोऽध्यायः

श्रीशुक उवाच

इन्द्रस्त्रिभुवनैश्‍वर्यमदोल्लङ्घितसत्पथः ।

मरुद्भिर्वसुभी रुद्रैरादित्यैर्ऋभुभिर्नृप॥ २✎ 1081 1082

indrastribhuvanaiśvaryamadollaṅghitasatpathaḥ |

marudbhirvasubhī rudrairādityair:ṛbhubhirnṛpa|| 2

अर्थ

श्रीशुकदेवजीने कहा—राजन्! इन्द्रको त्रिलोकीका ऐश्‍वर्य पाकर घमण्ड हो गया था। इस घमण्डके कारण वे धर्ममर्यादाका, सदाचारका उल्लंघन करने लगे थे। एक दिनकी बात है, वे भरी सभामें अपनी पत्‍नी शचीके साथ ऊँचे सिंहासनपर बैठे हुए थे, उनचास मरुद्गण, आठ वसु, ग्यारह रुद्र, आदित्य, ऋभुगण, विश्वेदेव, साध्यगण और दोनों अश्विनीकुमार उनकी सेवामें उपस्थित थे। सिद्ध, चारण, गन्धर्व, ब्रह्मवादी मुनिगण, विद्याधर, अप्सराएँ, किन्‍नर, पक्षी और नाग उनकी सेवा और स्तुति कर रहे थे। सब ओर ललित स्वरसे देवराज इन्द्रकी कीर्तिका गान हो रहा था। ऊपरकी ओर चन्द्रमण्डलके समान सुन्दर श्वेत छत्र शोभायमान था। चँवर, पंखे आदि महाराजोचित सामग्रियाँ यथास्थान सुसज्जित थीं। इस दिव्य समाजमें देवराज बड़े ही सुशोभित हो रहे थे॥ २—६॥

यह अर्थ श्लोक 2–6 का एक साथ है, जैसा मुद्रित ग्रन्थमें।

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #1081 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): रुद्रैरादित्यैऋर्भुभिर्नृप॥ → रुद्रैरादित्यैऋर्ऋभुभिर्नृप॥
  • #1082 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): रुद्रैरादित्यैऋर्ऋभुभिर्नृप॥ → रुद्रैरादित्यैर्ऋभुभिर्नृप॥

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