श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 6.7.23

षष्ठ स्कन्ध · अध्याय 7 · अथ सप्तमोऽध्यायः

मघवन् द्विषतः पश्य प्रक्षीणान् गुर्वतिक्रमात्।

सम्प्रत्युपचितान् भूयः काव्यमाराध्य भक्तितः।

आददीरन् निलयनं ममापि भृगुदेवताः॥ २३

maghavan dviṣataḥ paśya prakṣīṇān gurvatikramāt|

sampratyupacitān bhūyaḥ kāvyamārādhya bhaktitaḥ|

ādadīran nilayanaṃ mamāpi bhṛgudevatāḥ|| 23

अर्थ

देवराज! देखो, तुम्हारे शत्रु भी पहले अपने गुरुदेव शुक्राचार्यका तिरस्कार करनेके कारण अत्यन्त निर्बल हो गये थे, परन्तु अब भक्तिभावसे उनकी आराधना करके वे फिर धन-जनसे सम्पन्‍न हो गये हैं। देवताओ! मुझे तो ऐसा मालूम पड़ रहा है कि शुक्राचार्यको अपना आराध्यदेव माननेवाले ये दैत्यलोग कुछ दिनोंमें मेरा ब्रह्मलोक भी छीन लेंगे॥ २३॥

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