श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 6.7.25

षष्ठ स्कन्ध · अध्याय 7 · अथ सप्तमोऽध्यायः

तद् विश्‍वरूपं भजताशु विप्रं

तपस्विनं त्वाष्ट्रमथात्मवन्तम्।

सभाजितोऽर्थान् स विधास्यते वो

यदि क्षमिष्यध्वमुतास्य कर्म॥ २५

tad viśvarūpaṃ bhajatāśu vipraṃ

tapasvinaṃ tvāṣṭramathātmavantam|

sabhājito'rthān sa vidhāsyate vo

yadi kṣamiṣyadhvamutāsya karma|| 25

अर्थ

इसलिये अब तुमलोग शीघ्र ही त्वष्टाके पुत्र विश्‍वरूपके पास जाओ और उन्हींकी सेवा करो। वे सच्चे ब्राह्मण, तपस्वी और संयमी हैं। यदि तुमलोग उनके असुरोंके प्रति प्रेमको क्षमा कर सकोगे और उनका सम्मान करोगे, तो वे तुम्हारा काम बना देंगे॥ २५॥

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