अनुक्रमणिका षष्ठ स्कन्ध अध्याय 8 श्लोक 42 ॥ श्रीहरिः ॥
एतां विद्यामधिगतो विश्वरूपाच्छतक्रतुः।
त्रैलोक्यलक्ष्मीं बुभुजे विनिर्जित्य मृधेऽसुरान्॥ ४२
etāṃ vidyāmadhigato viśvarūpācchatakratuḥ|
trailokyalakṣmīṃ bubhuje vinirjitya mṛdhe'surān|| 42
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परीक्षित्! शतक्रतु इन्द्रने आचार्य विश्वरूपजीसे यह वैष्णवी विद्या प्राप्त करके रणभूमिमें असुरोंको जीत लिया और वे त्रैलोक्यलक्ष्मीका उपभोग करने लगे॥ ४२॥
इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां षष्ठस्कन्धे नारायणवर्मकथनं नामाष्टमोऽध्यायः ॥ ८॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 6.8.42 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 743) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/6/8/42/
मुद्रित ग्रन्थमें: प्रथम खण्ड, पृष्ठ 743
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एतां विद्यामधिगतो विश्वरूपाच्छतक्रतुः।
त्रैलोक्यलक्ष्मीं बुभुजे विनिर्जित्य मृधेऽसुरान्॥ ४२
परीक्षित्! शतक्रतु इन्द्रने आचार्य विश्वरूपजीसे यह वैष्णवी विद्या प्राप्त करके रणभूमिमें असुरोंको जीत लिया और वे त्रैलोक्यलक्ष्मीका उपभोग करने लगे॥ ४२॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 6.8.42 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 743) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/6/8/42/