श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 6.9.23

षष्ठ स्कन्ध · अध्याय 9 · अथ नवमोऽध्यायः

यस्योरुशृङ्गे जगतीं स्वनावं

मनुर्यथाऽऽबध्य ततार दुर्गम्।

स एव नस्त्वाष्ट्रभयाद् दुरन्तात्

त्राताऽऽश्रितान् वारिचरोऽपि नूनम्॥ २३

yasyoruśṛṅge jagatīṃ svanāvaṃ

manuryathā''badhya tatāra durgam|

sa eva nastvāṣṭrabhayād durantāt

trātā''śritān vāricaro'pi nūnam|| 23

अर्थ

वैवस्वत मनु पिछले कल्पके अन्तमें जिनके विशाल सींगमें पृथ्वीरूप नौकाको बाँधकर अनायास ही प्रलयकालीन संकटसे बच गये, वे ही मत्स्यभगवान् हम शरणागतोंको वृत्रासुरके द्वारा उपस्थित किये हुए दुस्तर भयसे अवश्य बचायेंगे॥ २३॥✎ 519 520

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #519 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् से → भगवान्‌से
  • #520 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् से → भगवान्‌से

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