श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 6.9.29

षष्ठ स्कन्ध · अध्याय 9 · अथ नवमोऽध्यायः

आत्मतुल्यैः षोडशभिर्विना श्रीवत्सकौस्तुभौ।

पर्युपासितमुन्‍निद्रशरदम्बुरुहेक्षणम् ॥ २९

ātmatulyaiḥ ṣoḍaśabhirvinā śrīvatsakaustubhau|

paryupāsitamunnidraśaradamburuhekṣaṇam || 29

अर्थ

भगवान्‌के नेत्र शरत्कालीन कमलके समान खिले हुए थे। उनके साथ सोलह पार्षद उनकी सेवामें लगे हुए थे। वे देखनेमें सब प्रकारसे भगवान्‌के समान ही थे। केवल उनके वक्षःस्थलपर श्रीवत्सका चिह्न और गलेमें कौस्तुभमणि नहीं थी॥ २९॥✎ 521 522

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #521 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की
  • #522 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की

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