श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 6.9.48

षष्ठ स्कन्ध · अध्याय 9 · अथ नवमोऽध्यायः

किं दुरापं मयि प्रीते तथापि विबुधर्षभाः।

मय्येकान्तमतिर्नान्यन्मत्तो वाञ्छति तत्त्ववित्॥ ४८

kiṃ durāpaṃ mayi prīte tathāpi vibudharṣabhāḥ|

mayyekāntamatirnānyanmatto vāñchati tattvavit|| 48

अर्थ

देवशिरोमणियो! मेरे प्रसन्‍न हो जानेपर कोई भी वस्तु दुर्लभ नहीं रह जाती। तथापि मेरे अनन्यप्रेमी तत्त्ववेत्ता भक्त मुझसे मेरे अतिरिक्त और कुछ भी नहीं चाहते॥ ४८॥✎ 523

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #523 शब्दोंके बीचका स्थान: श्रीभगवान् ने → श्रीभगवान्‌ने

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