svayaṃ niḥśreyasaṃ vidvān na vaktyajñāya karma hi|
na rāti rogiṇo'pathyaṃ vāñchato hi bhiṣaktamaḥ|| 50
अर्थ
जो पुरुष मुक्तिका स्वरूप जानता है, वह अज्ञानीको भी कर्मोंमें फँसनेका उपदेश नहीं देता—जैसे रोगीके चाहते रहनेपर भी सद्वैद्य उसे कुपथ्य नहीं देता॥ ५०॥
स्वयं निःश्रेयसं विद्वान् न वक्त्यज्ञाय कर्म हि।
न राति रोगिणोऽपथ्यं वाञ्छतो हि भिषक्तमः॥ ५०
जो पुरुष मुक्तिका स्वरूप जानता है, वह अज्ञानीको भी कर्मोंमें फँसनेका उपदेश नहीं देता—जैसे रोगीके चाहते रहनेपर भी सद्वैद्य उसे कुपथ्य नहीं देता॥ ५०॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 6.9.50 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 752) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/6/9/50/