श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 6.9.53

षष्ठ स्कन्ध · अध्याय 9 · अथ नवमोऽध्यायः

दध्यङ्ङाथर्वणस्त्वष्ट्रे वर्माभेद्यं मदात्मकम्।

विश्‍वरूपाय यत् प्रादात् त्वष्टा यत् त्वमधास्ततः॥ ५३

dadhyaṅṅātharvaṇastvaṣṭre varmābhedyaṃ madātmakam|

viśvarūpāya yat prādāt tvaṣṭā yat tvamadhāstataḥ|| 53

अर्थ

अथर्ववेदी दधीचि ऋषिने ही पहले-पहल मेरे स्वरूपभूत अभेद्य नारायणकवचका त्वष्टाको उपदेश किया था। त्वष्टाने वही विश्‍वरूपको दिया और विश्‍वरूपसे तुम्हें मिला॥ ५३॥

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