॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 7.1.10
यदा सिसृक्षुः पुर१ आत्मनः परो
रजः सृजत्येष पृथक् स्वमायया।
सत्त्वं विचित्रासु रिरंसुरीश्वरः
शयिष्यमाणस्तम ईरयत्यसौ॥ १०
yadā sisṛkṣuḥ pura ātmanaḥ paro
rajaḥ sṛjatyeṣa pṛthak svamāyayā|
sattvaṃ vicitrāsu riraṃsurīśvaraḥ
śayiṣyamāṇastama īrayatyasau|| 10
अर्थ
जब परमेश्वर अपने लिये शरीरोंका निर्माण करना चाहते हैं, तब अपनी मायासे रजोगुणकी अलग सृष्टि करते हैं। जब वे विचित्र योनियोंमें रमण करना चाहते हैं, तब सत्त्वगुणकी सृष्टि करते हैं और जब वे शयन करना चाहते हैं, तब तमोगुणको बढ़ा देते हैं॥ १०॥
टिप्पणियाँ
- १
प्रा० पा०—पुनरात्मनः।