श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 7.1.12

सप्तम स्कन्ध · अध्याय 1 · अथ प्रथमोऽध्यायः

अत्रैवोदाहृतः पूर्वमितिहासः सुरर्षिणा।

प्रीत्या महाक्रतौ राजन् पृच्छतेऽजातशत्रवे॥ १२

atraivodāhṛtaḥ pūrvamitihāsaḥ surarṣiṇā|

prītyā mahākratau rājan pṛcchate'jātaśatrave|| 12

अर्थ

राजन्! इसी विषयमें देवर्षि नारदने बड़े प्रेमसे एक इतिहास कहा था। यह उस समयकी बात है, जब राजसूय यज्ञमें तुम्हारे दादा युधिष्ठिरने उनसे इस सम्बन्धमें एक प्रश्न किया था॥ १२॥✎ 1615

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1615 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: आश्‍चर्य-जनक → आश्‍चर्यजनक

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