नारदजीने कहा—युधिष्ठिर! निन्दा, स्तुति, सत्कार और तिरस्कार—इस शरीरके ही तो होते हैं। इस शरीरकी कल्पना प्रकृति और पुरुषका ठीक-ठीक विवेक न होनेके कारण ही हुई है॥ २२॥
निन्दनस्तवसत्कारन्यक्कारार्थं कलेवरम्।
प्रधानपरयो राजन्नविवेकेन कल्पितम्॥ २२
नारदजीने कहा—युधिष्ठिर! निन्दा, स्तुति, सत्कार और तिरस्कार—इस शरीरके ही तो होते हैं। इस शरीरकी कल्पना प्रकृति और पुरुषका ठीक-ठीक विवेक न होनेके कारण ही हुई है॥ २२॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 7.1.22 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 807) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/7/1/22/