॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 7.1.4
श्रीशुक उवाच
साधु पृष्टं महाराज हरेश्चरितमद्भुतम्।
यद् भागवतमाहात्म्यं भगवद्भक्तिवर्धनम्॥ ४
sādhu pṛṣṭaṃ mahārāja hareścaritamadbhutam|
yad bhāgavatamāhātmyaṃ bhagavadbhaktivardhanam|| 4
अर्थ
श्रीशुकदेवजीने कहा—महाराज! भगवान्के अद्भुत चरित्रके सम्बन्धमें तुमने बड़ा सुन्दर प्रश्न किया; क्योंकि ऐसे प्रसंग प्रह्लाद आदि भक्तोंकी महिमासे परिपूर्ण होते हैं, जिसके श्रवणसे भगवान्की भक्ति बढ़ती है॥ ४॥ इस परम पुण्यमय प्रसंगको नारदादि महात्मागण बड़े प्रेमसे गाते रहते हैं। अब मैं अपने पिता श्रीकृष्ण-द्वैपायन मुनिको नमस्कार करके भगवान्की लीला-कथाका वर्णन करता हूँ॥ ५॥ वास्तवमें भगवान् निर्गुण, अजन्मा, अव्यक्त और प्रकृतिसे परे हैं। ऐसा होनेपर भी अपनी मायाके गुणोंको स्वीकार करके वे बाध्य-बाधकभावको अर्थात् मरने और मारनेवाले दोनोंके परस्पर-विरोधी रूपोंको ग्रहण करते हैं॥ ६॥ ✎ 562 563