परन्तु प्रह्लाद सर्वात्मा भगवान्के परम प्रिय हो चुके थे, समदर्शी हो चुके थे। उनके हृदयमें अटल शान्ति थी। भगवान्के प्रभावसे वे सुरक्षित थे। इसलिये तरह-तरहसे चेष्टा करनेपर भी हिरण्यकशिपु उनको मार डालनेमें समर्थ न हुआ॥ ४२॥
सर्वभूतात्मभूतं तं प्रशान्तं समदर्शनम्।
भगवत्तेजसा स्पृष्टं नाशक्नोद्धन्तुमुद्यमैः॥ ४२
परन्तु प्रह्लाद सर्वात्मा भगवान्के परम प्रिय हो चुके थे, समदर्शी हो चुके थे। उनके हृदयमें अटल शान्ति थी। भगवान्के प्रभावसे वे सुरक्षित थे। इसलिये तरह-तरहसे चेष्टा करनेपर भी हिरण्यकशिपु उनको मार डालनेमें समर्थ न हुआ॥ ४२॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 7.1.42 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 810) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/7/1/42/