श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 7.1.42

सप्तम स्कन्ध · अध्याय 1 · अथ प्रथमोऽध्यायः

स१र्वभूतात्मभूतं तं प्रशान्तं समदर्शनम्।

भगवत्तेजसा स्पृष्टं नाशक्नोद्धन्तुमुद्यमैः॥ ४२

sarvabhūtātmabhūtaṃ taṃ praśāntaṃ samadarśanam|

bhagavattejasā spṛṣṭaṃ nāśaknoddhantumudyamaiḥ|| 42

अर्थ

परन्तु प्रह्लाद सर्वात्मा भगवान्‌के परम प्रिय हो चुके थे, समदर्शी हो चुके थे। उनके हृदयमें अटल शान्ति थी। भगवान्‌के प्रभावसे वे सुरक्षित थे। इसलिये तरह-तरहसे चेष्टा करनेपर भी हिरण्यकशिपु उनको मार डालनेमें समर्थ न हुआ॥ ४२॥

टिप्पणियाँ

  1. १

    प्रा० पा०—तं सर्वभूतसुहृदं प्रशा०।

    (मुद्रित पृष्ठ 810)

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