श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 7.1.6

सप्तम स्कन्ध · अध्याय 1 · अथ प्रथमोऽध्यायः

निर्गुणोऽपि ह्यजोऽव्यक्तो भगवान् प्रकृतेः परः।

स्वमायागुणमाविश्य बाध्यबाधकतां गतः॥ ६

nirguṇo'pi hyajo'vyakto bhagavān prakṛteḥ paraḥ|

svamāyāguṇamāviśya bādhyabādhakatāṃ gataḥ|| 6

अर्थ

वास्तवमें भगवान् निर्गुण, अजन्मा, अव्यक्त और प्रकृतिसे परे हैं। ऐसा होनेपर भी अपनी मायाके गुणोंको स्वीकार करके वे बाध्य-बाधकभावको अर्थात् मरने और मारनेवाले दोनोंके परस्पर-विरोधी रूपोंको ग्रहण करते हैं॥ ६॥✎ 562 563

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #562 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की
  • #563 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की

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