श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 7.10.11

सप्तम स्कन्ध · अध्याय 10 · अथ दशमोऽध्यायः

नृसिंह उवाच

नैकान्तिनो मे मयि जात्विहाशिष

आशासतेऽमुत्र च ये भवद्विधाः।

अथापि मन्वन्तरमेतदत्र

दैत्येश्‍वराणामनुभुङ्क्ष्व भोगान्॥ ११

naikāntino me mayi jātvihāśiṣa

āśāsate'mutra ca ye bhavadvidhāḥ|

athāpi manvantarametadatra

daityeśvarāṇāmanubhuṅkṣva bhogān|| 11

अर्थ

श्रीनृसिंहभगवान्‌ने कहा—प्रह्लाद! तुम्हारे-जैसे मेरे एकान्तप्रेमी इस लोक अथवा परलोककी किसी भी वस्तुके लिये कभी कोई कामना नहीं करते। फिर भी अधिक नहीं, केवल एक मन्वन्तरतक मेरी प्रसन्‍नताके लिये तुम इस लोकमें दैत्याधिपतियोंके समस्त भोग स्वीकार कर लो॥ ११॥✎ 625

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #625 शब्दोंके बीचका स्थान: श्रीनृसिंहभगवान् ने → श्रीनृसिंहभगवान्‌ने

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