मैंने इसे वर दे दिया था कि मेरी सृष्टिका कोई भी प्राणी तुम्हारा वध न कर सकेगा। इससे यह मतवाला हो गया था। तपस्या, योग और बलके कारण उच्छृङ्खल होकर इसने वेदविधियोंका उच्छेद कर दिया था॥ २७॥
योऽसौ लब्धवरो मत्तो न वध्यो मम सृष्टिभिः।
तपोयोगबलोन्नद्धः समस्तनिगमानहन्॥ २७
मैंने इसे वर दे दिया था कि मेरी सृष्टिका कोई भी प्राणी तुम्हारा वध न कर सकेगा। इससे यह मतवाला हो गया था। तपस्या, योग और बलके कारण उच्छृङ्खल होकर इसने वेदविधियोंका उच्छेद कर दिया था॥ २७॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 7.10.27 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 870) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/7/10/27/