श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 7.10.4

सप्तम स्कन्ध · अध्याय 10 · अथ दशमोऽध्यायः

नान्यथा तेऽखिलगुरो घटेत२ करुणात्मनः।

यस्त आशिष आशास्ते न स भृत्यः स वै वणिक्॥ ४

nānyathā te'khilaguro ghaṭeta karuṇātmanaḥ|

yasta āśiṣa āśāste na sa bhṛtyaḥ sa vai vaṇik|| 4

अर्थ

जगद‍्गुरो! परीक्षाके सिवा ऐसा कहनेका और कोई कारण नहीं दीखता; क्योंकि आप परम दयालु हैं। (अपने भक्तको भोगोंमें फँसानेवाला वर कैसे दे सकते हैं?) आपसे जो सेवक अपनी कामनाएँ पूर्ण करना चाहता है, वह सेवक नहीं; वह तो लेन-देन करनेवाला निरा बनिया है॥ ४॥

टिप्पणियाँ

  1. २

    प्रा० पा०—घटते।

    (मुद्रित पृष्ठ 867)

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