जो मनुष्य परम पुरुष परमात्माकी यह श्रीनृसिंह-लीला, सेनापतियोंसहित हिरण्यकशिपुका वध और संतशिरोमणि प्रह्लादजीका पावन प्रभाव एकाग्र मनसे पढ़ता और सुनता है, वह भगवान्के अभयपद वैकुण्ठको प्राप्त होता है॥ ४७॥
एतद् य आदिपुरुषस्य मृगेन्द्रलीलां
दैत्येन्द्रयूथपवधं प्रयतः पठेत।
दैत्यात्मजस्य च सतां प्रवरस्य पुण्यं
श्रुत्वानुभावमकुतोभयमेति लोकम्॥ ४७
जो मनुष्य परम पुरुष परमात्माकी यह श्रीनृसिंह-लीला, सेनापतियोंसहित हिरण्यकशिपुका वध और संतशिरोमणि प्रह्लादजीका पावन प्रभाव एकाग्र मनसे पढ़ता और सुनता है, वह भगवान्के अभयपद वैकुण्ठको प्राप्त होता है॥ ४७॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 7.10.47 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 872) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/7/10/47/