श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 7.11.19

सप्तम स्कन्ध · अध्याय 11 · अथैकादशोऽध्यायः

ऋतमुञ्छशिलं प्रोक्तममृतं यदयाचितम्।

मृतं तु नित्ययाच्ञा स्यात् प्रमृतं कर्षणं स्मृतम्॥ १९

ṛtamuñchaśilaṃ proktamamṛtaṃ yadayācitam|

mṛtaṃ tu nityayācñā syāt pramṛtaṃ karṣaṇaṃ smṛtam|| 19

अर्थ

बाजारमें पड़े हुए अन्‍न (उञ्छ) तथा खेतोंमें पड़े हुए अन्‍न (शिल)-को बीनकर ‘शिलोञ्छ’ वृत्तिसे जीविका-निर्वाह करना ‘ऋत’ है। बिना माँगे जो कुछ मिल जाय, उसी अयाचित (शालीन) वृत्तिके द्वारा जीवन-निर्वाह करना ‘अमृत’ है। नित्य माँगकर लाना अर्थात् ‘यायावर’ वृत्तिके द्वारा जीवन-यापन करना ‘मृत’ है। कृषि आदिके द्वारा ‘वार्ता’ वृत्तिसे जीवन-निर्वाह करना ‘प्रमृत’ है॥ १९॥

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