श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 7.11.5

सप्तम स्कन्ध · अध्याय 11 · अथैकादशोऽध्यायः

नारद उवाच

नत्वा भगवतेऽजाय लोकानां धर्महेतवे।

वक्ष्ये सनातनं धर्मं नारायणमुखाच्छ्रुतम्॥ ५

natvā bhagavate'jāya lokānāṃ dharmahetave|

vakṣye sanātanaṃ dharmaṃ nārāyaṇamukhācchrutam|| 5

अर्थ

नारदजीने कहा—युधिष्ठिर! अजन्मा भगवान् ही समस्त धर्मोंके मूल कारण हैं। वही प्रभु चराचर जगत‍्के कल्याणके लिये धर्म और दक्षपुत्री मूर्तिके द्वारा अपने अंशसे अवतीर्ण होकर बदरिकाश्रममें तपस्या कर रहे हैं। उन नारायणभगवान्‌को नमस्कार करके उन्हींके मुखसे सुने हुए सनातनधर्मका मैं वर्णन करता हूँ॥ ५-६॥✎ 636

यह अर्थ श्लोक 5–6 का एक साथ है, जैसा मुद्रित ग्रन्थमें।

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #636 शब्दोंके बीचका स्थान: नारायणभगवान् को → नारायणभगवान्‌को

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