श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 7.12.11

सप्तम स्कन्ध · अध्याय 12 · अथ द्वादशोऽध्यायः

एतत् सर्वं गृहस्थस्य समाम्नातं यतेरपि।

गुरुवृत्तिर्विकल्पेन गृहस्थस्यर्तुगामिनः१॥ ११

etat sarvaṃ gṛhasthasya samāmnātaṃ yaterapi|

guruvṛttirvikalpena gṛhasthasyartugāminaḥ|| 11

अर्थ

ये सब शील-रक्षादि गुण गृहस्थके लिये और संन्यासीके लिये भी विहित हैं। गृहस्थके लिये गुरुकुलमें रहकर गुरुकी सेवा-शुश्रूषा वैकल्पिक है, क्योंकि ऋतुगमनके कारण उसे वहाँसे अलग भी होना पड़ता है॥ ११॥

टिप्पणियाँ

  1. १

    प्रा० पा०—कामिनः।

     

    (मुद्रित पृष्ठ 880)

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