श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
⌕

॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 7.12.18

सप्तम स्कन्ध · अध्याय 12 · अथ द्वादशोऽध्यायः

न कृष्टपच्यमश्नीयादकृष्टं चाप्यकालतः।

अग्‍निपक्‍वमथामं वा अर्कपक्‍वमुताहरेत्॥ १८

na kṛṣṭapacyamaśnīyādakṛṣṭaṃ cāpyakālataḥ|

agnipakvamathāmaṃ vā arkapakvamutāharet|| 18

अर्थ

वानप्रस्थ-आश्रमीको जोती हुई भूमिमें उत्पन्‍न होनेवाले चावल, गेहूँ आदि अन्‍न नहीं खाने चाहिये। बिना जोते पैदा हुआ अन्‍न भी यदि असमयमें पका हो, तो उसे भी न खाना चाहिये। आगसे पकाया हुआ या कच्चा अन्‍न भी न खाय। केवल सूर्यके तापसे पके हुए कन्द, मूल, फल आदिका ही सेवन करे॥ १८॥

पढ़नेकी विधि

अक्षरका आकार
सामान्य
अध्यायमें क्या दिखे
रोमन लिप्यन्तरण (IAST)
पंक्तियोंके बीच
रंग
सहायता

ये विकल्प केवल इसी ब्राउज़रमें रहते हैं; कहीं भेजे नहीं जाते। कुंजियाँ: ?

↑ ↓ चुनें · Enter खोलें · Esc बन्द

कुंजियाँ

←→
पिछला या अगला पृष्ठ (श्लोक, या अध्याय)
/
खोज
CtrlK
किसी अध्याय या श्लोकपर सीधे जाएँ (Mac: ⌘ K)
AltA
पढ़नेकी विधि
?
यह सूची
Esc
खुली सूची बन्द करें