श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 7.13.16

सप्तम स्कन्ध · अध्याय 13 · अथ त्रयोदशोऽध्यायः

बिभर्षि कायं पीवानं सोद्यमो भोगवान्यथा।

वित्तं चैवोद्यमवतां भोगो वित्तवतामिह।

भोगिनां खलु देहोऽयं पीवा भवति नान्यथा॥ १६

bibharṣi kāyaṃ pīvānaṃ sodyamo bhogavānyathā|

vittaṃ caivodyamavatāṃ bhogo vittavatāmiha|

bhogināṃ khalu deho'yaṃ pīvā bhavati nānyathā|| 16

अर्थ

‘भगवन्! आपका शरीर उद्योगी और भोगी पुरुषोंके समान हृष्ट-पुष्ट है। संसारका यह नियम है कि उद्योग करनेवालोंको धन मिलता है, धनवालोंको ही भोग प्राप्त होता है और भोगियोंका ही शरीर हृष्ट-पुष्ट होता है। और कोई दूसरा कारण तो हो नहीं सकता॥ १६॥

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