॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 7.13.24
यदृच्छया लोकमिमं प्रापितः कर्मभिर्भ्रमन्।
स्वर्गापवर्गयोर्द्वारं तिरश्चां पुनरस्य च॥ २४
yadṛcchayā lokamimaṃ prāpitaḥ karmabhirbhraman|
svargāpavargayordvāraṃ tiraścāṃ punarasya ca|| 24
अर्थ
कर्मोंके कारण अनेकों योनियोंमें भटकते-भटकते दैववश मुझे यह मनुष्ययोनि मिली है, जो स्वर्ग, मोक्ष, तिर्यग्योनि तथा इस मानवदेहकी भी प्राप्तिका द्वार है—इसमें पुण्य करें तो स्वर्ग, पाप करें तो पशु-पक्षी आदिकी योनि, निवृत्त हो जायँ तो मोक्ष और दोनों प्रकारके कर्म किये जायँ तो फिर मनुष्ययोनिकी ही प्राप्ति हो सकती है॥ २४॥