श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 7.13.27

सप्तम स्कन्ध · अध्याय 13 · अथ त्रयोदशोऽध्यायः

इत्येतदात्मनः स्वार्थं सन्तं विस्मृत्य वै पुमान्।

विचित्रामसति द्वैते घोरामाप्नोति संसृतिम्॥ २७

ityetadātmanaḥ svārthaṃ santaṃ vismṛtya vai pumān|

vicitrāmasati dvaite ghorāmāpnoti saṃsṛtim|| 27

अर्थ

मनुष्य अपने सच्चे स्वार्थ अर्थात् वास्तविक सुखको, जो अपना स्वरूप ही है, भूलकर इस मिथ्या द्वैतको सत्य मानता हुआ अत्यन्त भयंकर और विचित्र जन्मों और मृत्युओंमें भटकता रहता है॥ २७॥

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