श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 7.13.42

सप्तम स्कन्ध · अध्याय 13 · अथ त्रयोदशोऽध्यायः

नाहं निन्दे न च स्तौमि स्वभावविषमं जनम्।

एतेषां श्रेय आशासे उतैकात्म्यं महात्मनि॥ ४२

nāhaṃ ninde na ca staumi svabhāvaviṣamaṃ janam|

eteṣāṃ śreya āśāse utaikātmyaṃ mahātmani|| 42

अर्थ

मनुष्योंके स्वभाव भिन्‍न-भिन्‍न होते ही हैं। अतः न तो मैं किसीकी निन्दा करता हूँ और न स्तुति ही। मैं केवल इनका परम कल्याण और परमात्मासे एकता चाहता हूँ॥ ४२॥

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