श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 7.13.44

सप्तम स्कन्ध · अध्याय 13 · अथ त्रयोदशोऽध्यायः

आत्मानुभूतौ तां मायां जुहुयात् सत्यदृङ्मुनिः।

ततो निरीहो विरमेत् स्वानुभूत्याऽऽत्मनि स्थितः॥ ४४

ātmānubhūtau tāṃ māyāṃ juhuyāt satyadṛṅmuniḥ|

tato nirīho viramet svānubhūtyā''tmani sthitaḥ|| 44

अर्थ

सत्यका अनुसन्धान करनेवाले मनुष्यको चाहिये कि जो नाना प्रकारके पदार्थ और उनके भेद-विभेद मालूम पड़ रहे हैं, उनको चित्तवृत्तिमें हवन कर दे। चित्तवृत्तिको इन पदार्थोंके सम्बन्धमें विविध भ्रम उत्पन्‍न करनेवाले मनमें, मनको सात्त्विक अहंकारमें और सात्त्विक अहंकारको महत्तत्त्वके द्वारा मायामें हवन कर दे। इस प्रकार ये सब भेद-विभेद और उनका कारण माया ही है, ऐसा निश्‍चय करके फिर उस मायाको आत्मानुभूतिमें स्वाहा कर दे। इस प्रकार आत्मसाक्षात्कारके द्वारा आत्मस्वरूपमें स्थित होकर निष्क्रिय एवं उपरत हो जाय॥ ४३-४४॥

यह अर्थ श्लोक 43–44 का एक साथ है, जैसा मुद्रित ग्रन्थमें।

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