श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 7.13.5

सप्तम स्कन्ध · अध्याय 13 · अथ त्रयोदशोऽध्यायः

सुप्तप्रबोधयोः सन्धावात्मनो गतिमात्मदृक्।

पश्यन्बन्धं च मोक्षं च मायामात्रं न वस्तुतः॥ ५

suptaprabodhayoḥ sandhāvātmano gatimātmadṛk|

paśyanbandhaṃ ca mokṣaṃ ca māyāmātraṃ na vastutaḥ|| 5

अर्थ

आत्मदर्शी संन्यासी सुषुप्ति और जागरणकी सन्धिमें अपने स्वरूपका अनुभव करे और बन्धन तथा मोक्ष दोनों ही केवल माया हैं, वस्तुतः कुछ नहीं—ऐसा समझे॥ ५॥

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