paśyanbandhaṃ ca mokṣaṃ ca māyāmātraṃ na vastutaḥ|| 5
अर्थ
आत्मदर्शी संन्यासी सुषुप्ति और जागरणकी सन्धिमें अपने स्वरूपका अनुभव करे और बन्धन तथा मोक्ष दोनों ही केवल माया हैं, वस्तुतः कुछ नहीं—ऐसा समझे॥ ५॥
सुप्तप्रबोधयोः सन्धावात्मनो गतिमात्मदृक्।
पश्यन्बन्धं च मोक्षं च मायामात्रं न वस्तुतः॥ ५
आत्मदर्शी संन्यासी सुषुप्ति और जागरणकी सन्धिमें अपने स्वरूपका अनुभव करे और बन्धन तथा मोक्ष दोनों ही केवल माया हैं, वस्तुतः कुछ नहीं—ऐसा समझे॥ ५॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 7.13.5 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 884) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/7/13/5/