श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 7.15.13

सप्तम स्कन्ध · अध्याय 15 · अथ पञ्चदशोऽध्यायः

धर्मबाधो विधर्मः स्यात् परधर्मोऽन्यचोदितः।

उपधर्मस्तु पाखण्डो दम्भो वा शब्दभिच्छलः॥ १३

dharmabādho vidharmaḥ syāt paradharmo'nyacoditaḥ|

upadharmastu pākhaṇḍo dambho vā śabdabhicchalaḥ|| 13

अर्थ

जिस कार्यको धर्मबुद्धिसे करनेपर भी अपने धर्ममें बाधा पड़े, वह ‘विधर्म’ है। किसी अन्यके द्वारा अन्य पुरुषके लिये उपदेश किया हुआ धर्म ‘परधर्म’ है। पाखण्ड या दम्भका नाम ‘उपधर्म’ अथवा ‘उपमा’ है। शास्त्रके वचनोंका दूसरे प्रकारका अर्थ कर देना ‘छल’ है॥ १३॥✎ 1617

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1617 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: निवृत्ति-परायण → निवृत्तिपरायण

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