श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 7.15.20

सप्तम स्कन्ध · अध्याय 15 · अथ पञ्चदशोऽध्यायः

कामस्यान्तं च२ क्षुत्तृड्भ्यां क्रोधस्यैतत्फलोदयात्।

जनो याति न लोभस्य जित्वा भुक्‍त्वा दिशो भुवः॥ २०

kāmasyāntaṃ ca kṣuttṛḍbhyāṃ krodhasyaitatphalodayāt|

jano yāti na lobhasya jitvā bhuktvā diśo bhuvaḥ|| 20

अर्थ

भूख और प्यास मिट जानेपर खाने-पीनेकी कामनाका अन्त हो जाता है। क्रोध भी अपना काम पूरा करके शान्त हो जाता है। परन्तु यदि मनुष्य पृथ्वीकी समस्त दिशाओंको जीत ले और भोग ले, तब भी लोभका अन्त नहीं होता॥ २०॥

टिप्पणियाँ

  1. २

    प्रा० पा०—हि।

    (मुद्रित पृष्ठ 895)

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