श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 7.15.27

सप्तम स्कन्ध · अध्याय 15 · अथ पञ्चदशोऽध्यायः

एष वै भगवान्साक्षात् प्रधानपुरुषेश्‍वरः।

योगेश्‍वरैर्विमृग्याङ्‌घ्रिर्लोको यं मन्यते नरम्॥ २७

eṣa vai bhagavānsākṣāt pradhānapuruṣeśvaraḥ|

yogeśvarairvimṛgyāṅghrirloko yaṃ manyate naram|| 27

अर्थ

बड़े-बड़े योगेश्‍वर जिनके चरणकमलोंका अनुसन्धान करते रहते हैं, प्रकृति और पुरुषके अधीश्‍वर वे स्वयं भगवान् ही गुरुदेवके रूपमें प्रकट हैं। इन्हें लोग भ्रमसे मनुष्य मानते हैं॥ २७॥

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