॥ श्रीहरिः ॥
यतो यतो निःसरति मनः कामहतं भ्रमत्।
ततस्तत उपाहृत्य हृदि रुन्ध्याच्छनैर्बुधः॥ ३३
yato yato niḥsarati manaḥ kāmahataṃ bhramat|
tatastata upāhṛtya hṛdi rundhyācchanairbudhaḥ|| 33
अर्थ
कामकी चोटसे घायल चित्त इधर-उधर चक्कर काटता हुआ जहाँ-जहाँ जाय, विद्वान् पुरुषको चाहिये कि वह वहाँ-वहाँसे उसे लौटा लाये और धीरे-धीरे हृदयमें रोके॥ ३३॥
यतो यतो निःसरति मनः कामहतं भ्रमत्।
ततस्तत उपाहृत्य हृदि रुन्ध्याच्छनैर्बुधः॥ ३३
कामकी चोटसे घायल चित्त इधर-उधर चक्कर काटता हुआ जहाँ-जहाँ जाय, विद्वान् पुरुषको चाहिये कि वह वहाँ-वहाँसे उसे लौटा लाये और धीरे-धीरे हृदयमें रोके॥ ३३॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 7.15.33 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 897) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/7/15/33/