yadi seveta tānbhikṣuḥ sa vai vāntāśyapatrapaḥ|| 36
अर्थ
जो संन्यासी पहले तो धर्म, अर्थ और कामके मूल कारण गृहस्थाश्रमका परित्याग कर देता है और फिर उन्हींका सेवन करने लगता है, वह निर्लज्ज अपने उगले हुएको खानेवाला कुत्ता ही है॥ ३६॥
यः प्रव्रज्य गृहात् पूर्वं त्रिवर्गावपनात् पुनः।
यदि सेवेत तान्भिक्षुः स वै वान्ताश्यपत्रपः॥ ३६
जो संन्यासी पहले तो धर्म, अर्थ और कामके मूल कारण गृहस्थाश्रमका परित्याग कर देता है और फिर उन्हींका सेवन करने लगता है, वह निर्लज्ज अपने उगले हुएको खानेवाला कुत्ता ही है॥ ३६॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 7.15.36 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 897) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/7/15/36/