॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 7.15.39
आश्रमापसदा ह्येते खल्वाश्रमविडम्बकाः।
देवमायाविमूढांस्तानुपेक्षेतानुकम्पया ॥ ३९
āśramāpasadā hyete khalvāśramaviḍambakāḥ|
devamāyāvimūḍhāṃstānupekṣetānukampayā || 39
अर्थ
कर्मत्यागी गृहस्थ, व्रतत्यागी ब्रह्मचारी, गाँवमें रहनेवाला तपस्वी (वानप्रस्थ) और इन्द्रियलोलुप संन्यासी—ये चारों आश्रमके कलंक हैं और व्यर्थ ही आश्रमोंका ढोंग करते हैं। भगवान्की मायासे विमोहित उन मूढ़ोंपर तरस खाकर उनकी उपेक्षा कर देनी चाहिये॥ ३८-३९॥✎ 646