श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 7.15.5

सप्तम स्कन्ध · अध्याय 15 · अथ पञ्चदशोऽध्यायः

देशे काले च सम्प्राप्ते मुन्यन्‍नं२ हरिदैवतम्।

श्रद्धया विधिवत् पात्रे न्यस्तं कामधुगक्षयम्॥ ५

deśe kāle ca samprāpte munyannaṃ haridaivatam|

śraddhayā vidhivat pātre nyastaṃ kāmadhugakṣayam|| 5

अर्थ

देश और कालके प्राप्त होनेपर ऋषि-मुनियोंके भोजन करनेयोग्य शुद्ध हविष्यान्‍न भगवान्‌को भोग लगाकर श्रद्धासे विधिपूर्वक योग्य पात्रको देना चाहिये। वह समस्त कामनाओंको पूर्ण करनेवाला और अक्षय होता है॥ ५॥✎ 645

टिप्पणियाँ

  1. २

    प्रा० पा०—मुच्यते दैवसङ्गतम्।

    (मुद्रित पृष्ठ 894)
इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #645 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् को → भगवान्‌को

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