देवि! जैसे प्याऊपर बहुत-से लोग इकट्ठे हो जाते हैं, परन्तु उनका मिलना-जुलना थोड़ी देरके लिये ही होता है—वैसे ही अपने कर्मोंके फेरसे दैववश जीव भी मिलते और बिछुड़ते हैं॥ २१॥
भूतानामिह संवासः प्रपायामिव सुव्रते।
दैवेनैकत्र नीतानामुन्नीतानां स्वकर्मभिः॥ २१
देवि! जैसे प्याऊपर बहुत-से लोग इकट्ठे हो जाते हैं, परन्तु उनका मिलना-जुलना थोड़ी देरके लिये ही होता है—वैसे ही अपने कर्मोंके फेरसे दैववश जीव भी मिलते और बिछुड़ते हैं॥ २१॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 7.2.21 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 813) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/7/2/21/