॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 7.2.3
करालदंष्ट्रोग्रदृष्ट्या दुष्प्रेक्ष्य३भ्रुकुटीमुखः।
शूलमुद्यम्य सदसि दानवानिदमब्रवीत्॥ ३
karāladaṃṣṭrogradṛṣṭyā duṣprekṣyabhrukuṭīmukhaḥ|
śūlamudyamya sadasi dānavānidamabravīt|| 3
अर्थ
उस समय विकराल दाढ़ों, आग उगलनेवाली उग्र दृष्टि और चढ़ी हुई भौंहोंके कारण उसका मुँह देखा न जाता था। भरी सभामें त्रिशूल उठाकर उसने द्विमूर्धा, त्र्यक्ष, शम्बर, शतबाहु, हयग्रीव, नमुचि, पाक, इल्वल, विप्रचित्ति, पुलोमा और शकुन आदिको सम्बोधन करके कहा—‘दैत्यो और दानवो! तुम सब लोग मेरी बात सुनो और उसके बाद जैसे मैं कहता हूँ, वैसे करो॥ ३—५॥✎ 580
टिप्पणियाँ
- ३
प्रा० पा०—क्ष्यो भ्रु०।