श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 7.2.31

सप्तम स्कन्ध · अध्याय 2 · अथ द्वितीयोऽध्यायः

उशीनरेन्द्रं विधिना तथा कृतं

पतिं महिष्यः प्रसमीक्ष्य दुःखिताः।

हताः स्म नाथेति करैरुरो भृशं

घ्नन्त्यो मुहुस्तत्पदयोरुपापतन्॥ ३१

uśīnarendraṃ vidhinā tathā kṛtaṃ

patiṃ mahiṣyaḥ prasamīkṣya duḥkhitāḥ|

hatāḥ sma nātheti karairuro bhṛśaṃ

ghnantyo muhustatpadayorupāpatan|| 31

अर्थ

रानियोंको दैववश अपने पतिदेव उशीनर नरेशकी यह दशा देखकर बड़ा दुःख हुआ। वे ‘हा नाथ! हम अभागिनें तो बेमौत मारी गयीं।’ यों कहकर बार-बार जोरसे छाती पीटती हुई अपने स्वामीके चरणोंके पास गिर पड़ीं॥ ३१॥

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