‘हाय! विधाता बड़ा क्रूर है। स्वामिन्! उसीने आज आपको हमारी आँखोंसे ओझल कर दिया। पहले तो आप समस्त देशवासियोंके जीवनदाता थे। आज उसीने आपको ऐसा बना दिया कि आप हमारा शोक बढ़ा रहे हैं॥ ३३॥
अहो विधात्राकरुणेन नः प्रभो
भवान् प्रणीतो दृगगोचरां दशाम्।
उशीनराणामसि वृत्तिदः पुरा
कृतोऽधुना येन शुचां विवर्धनः॥ ३३
‘हाय! विधाता बड़ा क्रूर है। स्वामिन्! उसीने आज आपको हमारी आँखोंसे ओझल कर दिया। पहले तो आप समस्त देशवासियोंके जीवनदाता थे। आज उसीने आपको ऐसा बना दिया कि आप हमारा शोक बढ़ा रहे हैं॥ ३३॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 7.2.33 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 814) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/7/2/33/