॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 7.2.37
यम उवाच
अहो अमीषां वयसाधिकानां
विपश्यतां लोकविधिं विमोहः।
यत्रागतस्तत्र गतं मनुष्यं
स्वयं सधर्मा अपि शोचन्त्यपार्थम्॥ ३७
aho amīṣāṃ vayasādhikānāṃ
vipaśyatāṃ lokavidhiṃ vimohaḥ|
yatrāgatastatra gataṃ manuṣyaṃ
svayaṃ sadharmā api śocantyapārtham|| 37
अर्थ
यमराज बोले—बड़े आश्चर्यकी बात है! ये लोग तो मुझसे सयाने हैं। बराबर लोगोंका मरना-जीना देखते हैं, फिर भी इतने मूढ़ हो रहे हैं। अरे! यह मनुष्य जहाँसे आया था, वहीं चला गया। इन लोगोंको भी एक-न-एक दिन वहीं जाना है। फिर झूठमूठ ये लोग इतना शोक क्यों करते हैं?॥ ३७॥✎ 2019