श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 7.2.41

सप्तम स्कन्ध · अध्याय 2 · अथ द्वितीयोऽध्यायः

भूतानि तैस्तैर्निजयोनिकर्मभि-

र्भवन्ति काले न भवन्ति सर्वशः।

न तत्र हात्मा प्रकृतावपि स्थित-

स्तस्या गुणैरन्यतमो निबध्यते॥ ४१

bhūtāni taistairnijayonikarmabhi-

rbhavanti kāle na bhavanti sarvaśaḥ|

na tatra hātmā prakṛtāvapi sthita-

stasyā guṇairanyatamo nibadhyate|| 41

अर्थ

रानियो! सभी प्राणियोंकी मृत्यु अपने पूर्वजन्मोंकी कर्मवासनाके अनुसार समयपर होती है और उसीके अनुसार उनका जन्म भी होता है। परन्तु आत्मा शरीरसे अत्यन्त भिन्‍न है, इसलिये वह उसमें रहनेपर भी उसके जन्म-मृत्यु आदि धर्मोंसे अछूता ही रहता है॥ ४१॥

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