श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 7.2.45

सप्तम स्कन्ध · अध्याय 2 · अथ द्वितीयोऽध्यायः

न श्रोता नानुवक्तायं मुख्योऽप्यत्र महानसुः।

यस्त्विहेन्द्रियवानात्मा स चान्यः प्राणदेहयोः॥ ४५

na śrotā nānuvaktāyaṃ mukhyo'pyatra mahānasuḥ|

yastvihendriyavānātmā sa cānyaḥ prāṇadehayoḥ|| 45

अर्थ

(तुम्हारी यह मान्यता कि ‘प्राण ही बोलने या सुननेवाला था, सो निकल गया’ मूर्खतापूर्ण है; क्योंकि सुषुप्तिके समय प्राण तो रहता है, पर न वह बोलता है न सुनता है।) शरीरमें सब इन्द्रियोंकी चेष्टाका हेतुभूत जो महाप्राण है, वह प्रधान होनेपर भी बोलने या सुननेवाला नहीं है; क्योंकि वह जड है। देह और इन्द्रियोंके द्वारा सब पदार्थोंका द्रष्टा जो आत्मा है, वह शरीर और प्राण दोनोंसे पृथक् है॥ ४५॥✎ 1860

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1860 अक्षर (एक स्थानपर, प्रमाणसहित): ४ ७॥ → ४७॥

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