श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 7.2.60

सप्तम स्कन्ध · अध्याय 2 · अथ द्वितीयोऽध्यायः

त२तः शोचत मा यूयं परं३ चात्मानमेव च।

क आत्मा कः परो वात्र स्वीयः पारक्य एव वा।

स्वपराभिनिवेशेन विनाज्ञानेन देहिनाम्॥ ६०

tataḥ śocata mā yūyaṃ paraṃ cātmānameva ca|

ka ātmā kaḥ paro vātra svīyaḥ pārakya eva vā|

svaparābhiniveśena vinājñānena dehinām|| 60

अर्थ

इसलिये तुमलोग भी अपने लिये या किसी दूसरेके लिये शोक मत करो। इस संसारमें कौन अपना है और कौन अपनेसे भिन्‍न? क्या अपना है और क्या पराया? प्राणियोंको अज्ञानके कारण ही यह अपने-परायेका दुराग्रह हो रहा है, इस भेद-बुद्धिका और कोई कारण नहीं है॥ ६०॥

टिप्पणियाँ

  1. २

    प्रा० पा०—अतः।

    (मुद्रित पृष्ठ 818)
  2. ३

    प्रा० पा०—परमात्मानमेव च।

    (मुद्रित पृष्ठ 818)

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