॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 7.3.15
न ददर्श प्रतिच्छन्नं वल्मीकतृणकीचकैः।
पिपीलिकाभिराचीर्णमेदस्त्वङ्मांसशोणितम् ॥ १५
na dadarśa praticchannaṃ valmīkatṛṇakīcakaiḥ|
pipīlikābhirācīrṇamedastvaṅmāṃsaśoṇitam || 15
अर्थ
वहाँ जानेपर पहले तो वे उसे देख ही न सके; क्योंकि दीमककी मिट्टी, घास और बाँसोंसे उसका शरीर ढक गया था। चींटियाँ उसकी मेदा, त्वचा, मांस और खून चाट गयी थीं॥ १५॥