श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 7.3.2

सप्तम स्कन्ध · अध्याय 3 · अथ तृतीयोऽध्यायः

स तेपे मन्दरद्रोण्यां तपः परमदारुणम्।

ऊर्ध्वबाहुर्नभोदृष्टिः पादाङ्गुष्ठाश्रितावनिः॥ २

sa tepe mandaradroṇyāṃ tapaḥ paramadāruṇam|

ūrdhvabāhurnabhodṛṣṭiḥ pādāṅguṣṭhāśritāvaniḥ|| 2

अर्थ

इसके लिये वह मन्दराचलकी एक घाटीमें जाकर अत्यन्त दारुण तपस्या करने लगा। वहाँ हाथ ऊपर उठाकर आकाशकी ओर देखता हुआ वह पैरके अँगूठेके बल पृथ्वीपर खड़ा हो गया॥ २॥

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