॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 7.4.14
जगुर्महेन्द्रासनमोजसा स्थितं
विश्वावसुस्तुम्बुरुरस्म२दादयः।
गन्धर्वसिद्धा ऋषयोऽस्तुवन्मुहु-
र्विद्याधरा अप्सरसश्च पाण्डव॥ १४
jagurmahendrāsanamojasā sthitaṃ
viśvāvasustumbururasmadādayaḥ|
gandharvasiddhā ṛṣayo'stuvanmuhu-
rvidyādharā apsarasaśca pāṇḍava|| 14
अर्थ
जब वह अपने पुरुषार्थसे इन्द्रासनपर बैठ गया, तब युधिष्ठिर! विश्वावसु, तुम्बुरु तथा हम सभी लोग उसके सामने गान करते थे। गन्धर्व, सिद्ध, ऋषिगण, विद्याधर और अप्सराएँ बार-बार उसकी स्तुति करती थीं॥ १४॥
टिप्पणियाँ
- २
प्रा० पा०—रुनारदादयः।