श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 7.4.20

सप्तम स्कन्ध · अध्याय 4 · अथ चतुर्थोऽध्यायः

एवमैश्‍वर्यमत्तस्य दृप्तस्योच्छास्त्रवर्तिनः।

कालो महान् व्यतीयाय ब्रह्मशापमुपेयुषः॥ २०

evamaiśvaryamattasya dṛptasyocchāstravartinaḥ|

kālo mahān vyatīyāya brahmaśāpamupeyuṣaḥ|| 20

अर्थ

युधिष्ठिर! इस रूपमें भी वह भगवान्‌का वही पार्षद है, जिसे सनकादिकोंने शाप दिया था। वह ऐश्‍वर्यके मदसे मतवाला हो रहा था तथा घमंडमें चूर होकर शास्त्रोंकी मर्यादाका उल्लंघन कर रहा था। देखते-ही-देखते उसके जीवनका बहुत-सा समय बीत गया॥ २०॥✎ 582 583

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #582 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की
  • #583 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की

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